Saturday, 28 June 2014



ॐ को ओम लिखना मजबूरी है, अन्यथा तो यह ॐ ही है.. अब आप ही सोचे इसे कैसे उच्चारित करें? ‘ॐ’ अद्भुत है.. यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है… ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना.. ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं… यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है..

महान वैज्ञानिक सर अलबर्ट आइंसटाइन ने भी यही कहा है ,कि ब्राह्मांड फैल रहा है.. आइंसटाइन से पहले जैन धर्मं के 

संसथापक श्रीमहावीर जी ने कहा था महावीरजी से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है.. महावीरजी ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा…

ॐ को ओम कहा जाता है.. उसमें भी बोलते वक्त ‘ओ’ पर ज्यादा जोर होता है.. इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं.. यही है सही मंत्र बाकी सभी गलत हैं.. इस मंत्र का प्रारंभ है ..अंत नहीं.. यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है.. अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की रगड़ या दो वस्तुओं या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं.. इसे अनहद भी कहते हैं..संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी रहता है..

तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है, जो लगातार सुनाई देती रहती है, शरीर के भीतर भी और बाहर भी…हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है, और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा को शांति प्राप्त होती है… तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम ….ॐ …

साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है.. फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी होता है, जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है, वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लग जाता है.. परमात्मा से जुड़ने का सबसे आसान साधारण तरीका है… ॐ का लगातार उच्चारण करते रहना…

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषदों में भी आता है.. यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है, और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है…

तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है,.. देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द को अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है… उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं इत्यादि .. इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं…

सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है.. इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है..इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है…

उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें.. ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं.. अलग – अलग आसन का अलग अलग प्रभाव होता है.. इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं.. ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं.. ॐ जप माला से भी कर सकते हैं… या फिर मानसिक रूप से अनवरत कर सकते हैं …

इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है … दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित रहता है … इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं..काम करने की शक्ति बढ़ जाती है.. इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं.. इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए..

प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं… अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है, जिससे रक्त में ‘टॉक्सिक’ पदार्थ पैदा होने लगते हैं.. इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन या नान टॉक्सिक’ पदार्थ पैदा होते हैं

Thursday, 26 June 2014

संपदा देवी की कथा



लोगों के मन में एक प्रश्न रहता है कि जिस होलिका ने प्रहलाद जैसे प्रभु भक्त को जलाने का प्रयत्न किया, उसका हजारों वर्षों से हम पूजन किसलिए करते हैं? होलिका-पूजन के पीछे एक बात है। जिस दिन होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने वाली थी, उस दिन नगर के सभी लोगों ने घर-घर में अग्नि प्रज्वलित कर प्रहलाद की रक्षा करने के लिए अग्निदेव से प्रार्थना की थी। लोकहृदय को प्रहलाद ने कैसे जीत लिया था, यह बात इस घटना में प्रतिबिम्बित होती है।


अग्निदेव ने लोगों के अंतःकरण की प्रार्थना को स्वीकार किया और लोगों की इच्छा के अनुसार ही हुआ। होलिका नष्ट हो गई और अग्नि की कसौटी में से पार उतरा हुआ प्रहलाद नरश्रेष्ठ बन गया। प्रहलाद को बचाने की प्रार्थना के रूप में प्रारंभ हुई घर-घर की अग्नि पूजा ने कालक्रमानुसार सामुदायिक पूजा का रूप लिया और उससे ही गली-गली में होलिका की पूजा प्रारंभ हुई।


संपदा देवी का पूजन~~~

धन-धान्य की देवी संपदाजी का पूजन होली के दूसरे दिन किया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ संपदा देवी का डोरा बाँधकर व्रत रखती हैं तथा कथा कहती-सुनती हैं। मिठाई युक्त भोजन से व्रत खोला जाता है। हाथ में बँधे डोरे को वैशाख माह में किसी भी शुभ दिन शुभ घड़ी में खोल दिया जाता है। यह डोरा खोलते समय भी व्रत रखकर कथा कही-सुनी जाती है।



संपदा देवी का पूजन निम्नानुसार होता है~~~

सर्वप्रथम पूजा की थाली में सारी पूजन सामग्री सजा लें।

संपदा देवी का डोरा लेकर इसमें सोलह गठानें लगाएँ। (यह डोरा सोलह तार के सूत का बना होता है तथा इसमें सोलह गठानें भी लगाने का विधान है।)

गठानें लगाने के बाद डोरे को हल्दी में रंग लें।

तत्पश्चात चौकी पर रोली-चावल के साथ कलश स्थापित कर उस पर डोरा बाँध दें।

इसके बाद कथा कहें-सुनें।

कथा के पश्चात संपदा देवी का पूजन करें।

इसके बाद संपदा देवी का डोरा धारण करें।

पूजन के बाद सूर्य के अर्घ्य दें।


संपदाजी की कथा~~~

एक समय की बात है। राजा नल अपनी पत्नी दमयंती के साथ बड़े प्रेम से राज्य करता था। होली के अगले दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई। उसने गले में पीला डोरा बाँधा था। रानी ने उससे डोरे के बारे में पूछा तो वह बोली- 'डोरा पहनने से सुख-संपत्ति, अन्न-धन घर में आता है।' रानी ने भी उससे डोरा माँगा। उसने रानी को विधिवत डोरा देकर कथा कही।


रानी के गले में डोरा बँधा देख राजा नल ने उसके बारे में पूछा। रानी ने सारी बात बता दी। राजा बोले- 'तुम्हें किस चीज की कमी है? इस डोरे को तोड़कर फेंक दो।' रानी ने देवता का आशीर्वाद कहकर उसे तोड़ने से इंकार कर दिया। पर राजा ने डोरा तोड़कर फेंक दिया। रानी बोली- 'राजन्*! यह आपने ठीक नहीं किया।'


उसी रात राजा के स्वप्न में दो स्त्रियाँ आईं। एक स्त्री बोली- 'राजा! मैं यहाँ से जा रही हूँ।' दूसरी स्त्री बोली- 'राजा मैं तेरे घर आ रही हूँ।' स्वप्न का यही क्रम 10-12 दिन तक चलता रहा। इससे राजा उदास रहने लगा। रानी ने उदासी का कारण पूछा तो राजा ने स्वप्न की बात बता दी। रानी ने राजा से उन दोनों स्त्रियों का नाम पूछने को कहा। तब राजा ने उनसे उनके नाम पूछे तो जाने वाली स्त्री ने अपना नाम 'लक्ष्मी' तथा आने वाली स्त्री ने 'दरिद्रता' बताया।


लक्ष्मी के जाते ही सब सोना-चाँदी मिट्टी हो गया। रानी सहायता के लिए अपनी सखियों के पास गई। पर उनको फटेहाल देख कोई भी उनसे नहीं बोला। दुःखी मन से राजा-रानी पाँच बरस के राजकुँवर के साथ जंगल में कंदमूल खाकर अपने दिन बिताने लगे। चलते-चलते राजकुँवर को भूख लगी तो रानी ने कहा- 'यहाँ पास ही एक मालन रहती है। जो मुझे फूलों को हार दे जाती थी। उससे थोड़ा छाछ-दही माँग लाओ।' राजा मालन के घर गया। वह दही बिलो रही थी। राजा के माँगने पर उसने कहा- 'हमारे पास तो छाछ-दही कुछ भी नहीं है।'


राजा खाली हाथ लौट आया। आगे चलने पर एक विषधर ने कुँवर को डस लिया और राजकुमार का प्राणांत हो गया। विलाप करती रानी को राजा ने धैर्य बँधाया। अब वे दोनों आगे चले। राजा दो तीतर मार लाया। भूने हुए तीतर भी उड़ गए। उधर राजा स्नान कर धोती सुखा रहा था कि धोती उड़ गई। रानी ने अपनी धोती फाड़कर राजा को दी। वे भूखे-प्यासे ही आगे चल दिए। मार्ग में राजा के मित्र का घर था। वहाँ जाकर उसने मित्र को अपने आने की सूचना दी। मित्र ने दोनों को एक कमरे में ठहरवाया। वहाँ मित्र ने लोहे के औजार आदि रखे हुए थे।


दैवयोग से वे सारे औजार धरती में समा गए। चोरी का दोष लगने के कारण वे दोनों रातो-रात वहाँ से भाग गए। आगे चलकर राजा की बहन का घर आया। बहन ने एक पुराने महल में उनके रहने की व्यवस्था की। सोने के थाल में उन्हें भोजन भेजा, पर थाली मिट्टी में बदल गई। राजा बड़ा लज्जित हुआ। थाल को वहीं गाड़कर दोनों फिर चल पड़े। आगे चलकर एक साहूकार का घर आया। वह साहूकार राजा के राज्य में व्यापार करने के लिए जाता था। साहूकार ने भी राजा को ठहरने के लिए पुरानी हवेली में सारी व्यवस्था कर दी। पुरानी हवेली में साहूकार की लड़की का हीरों का हार लटका हुआ था। पास ही दीवार पर एक मोर अंकित था। वह मोर ही हार निगलने लगा। यह देखकर राजा-रानी वहाँ से भी चले गए।


अब रानी बोली- 'किसी के घर जाने के बजाए जंगल में लकड़ी काट-बेचकर ही हम अपना पेट भर लेंगे।' रानी की बात से राजा सहमत हुआ। अतः वे एक सूखे बगीचे में जाकर रहने लगे। राजा-रानी के बाग में जाते ही बाग हरा-भरा हो गया। बाग का मालिक भी बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने देखा वहाँ एक स्त्री-पुरुष सो रहे थे। उन्हें जगाकर बाग के मालिक ने पूछा- 'तुम कौन हो?' राजा बोला- 'मुसाफिर हैं. मजदूरी की खोज में इधर आए हैं। यदि तुम रखो तो यहीं हम मेहनत-मजदूरी करके पेट पाल लेंगे।' दोनों वहीं नौकरी करने लगे।


एक दिन बाग की मालकिन संपदा देवी की कथा सुन डोरा ले रही थी। रानी के पूछने पर उसने बताया कि यह संपदा देवी का डोरा है। रानी ने भी कथा सुनी। डोरा लिया। राजा ने फिर पत्नी से पूछा कि यह डोरा कैसा बाँधा है? तो रानी बोली- 'यह वही डोरा है जिसे आपने एक बार तोड़कर फेंक दिया था। उसी के कारण संपदा देवी हम पर नाराज हैं।' रानी फिर बोली- 'यदि संपदा माँ सच्ची हैं तो फिर हमारे पहले के दिन लौट आएँगे।'


उसी रात राजा को पहले की तरह स्वप्न आया। एक स्त्री कह रही है- 'मैं जा रही हूँ।' दूसरी कह रही है- 'राजा! मैं वापस आ रही हूँ।' राजा ने दोनों के नाम पूछे तो आने वाली ने अपना नाम 'लक्ष्मी' और जाने वाली ने 'दरिद्रता' बताया। राजा ने लक्ष्मी से पूछा अब जाओगी तो नहीं? लक्ष्मी बोली- यदि तुम्हारी पत्नी संपदाजी का डोरा लेकर कथा सुनती रहेगी तो मैं नहीं जाऊँगी।


यदि तुम डोरा तोड़ दोगे तो चली जाऊँगी। बाग की मालकिन जब वहाँ की रानी को हार देने जाती तो दमयंती हार गूँथकर देती। हार देखकर रानी बड़ी प्रसन्न हुई। उसने पूछा कि हार किसने बनाया है तो मालन ने कहा- 'कोई पति-पत्नी बाग में मजदूरी करते हैं। उन्होंने ही बनाया है।' रानी ने मालन को दोनों परदेसियों के नाम पूछने को कहा। उन्होंने अपना नाम नल-दमयंती बता दिया। मालन दोनों से क्षमायाचना करने लगी। राजा ने उससे कहा- 'इसमें तुम्हारा क्या दोष है। हमारे दिन ही खराब थे।'


अब दोनों अपने राजमहलों की तरफ चले। राह में साहूकार का घर आया। वह साहूकार के पास गया। साहूकार ने नई हवेली में उनके ठहरने का प्रबंध किया तो राजा बोला- 'मैं तो पुरानी हवेली में ही ठहरूँगा।' वहाँ साहूकार ने देखा दीवार पर चित्रित मोर नौलखे हार उगल रहा था। साहूकार ने राजा के पैर पकड़ लिए। राजा ने कहा- 'दोष तुम्हारा नहीं। मेरे दिन ही बुरे थे।'


राजा आगे चलकर बहन के घर पहुँचा। बहन ने नए महल में ही रहने की जिद की। पैरों के नीचे की धरती खोदी तो हीरों से जड़ित थाल वहाँ से निकल आया। राजा ने बहन को वह थाल भेंट स्वरूप दिया। राजा आगे चल मित्र के घर पहुँचे तो उसने नए मकान में ठहरने की व्यवस्था की, पर राजा पुराने कमरे में ही ठहरा। वहीं मित्र के लोहे के औजार मिल गए। आगे चले तो नदी किनारे जहाँ राजा की धोती उड़ गई थी वह एक वृक्ष से लटकी हुई थी। वहाँ नहा-धोकर धोती पहने राजा आगे चला तो देखा कि कुँवर खेल रहा है।


माँ-बाप को देखकर उसने उनके पैर छुए। नगर में पहुँचकर राजा की मालन दूर्बा लेकर आई तो राजा बोला- 'आज दूर्बा लेकर आ रही हो उस दिन छाछ के लिए मना कर दिया था।' रानी ने राजा से कहा- 'वह तो तुम्हारे बुरे दिनों का प्रभाव था।' महलों में गए। रानी की सखियाँ धन-धान्य से भरे थाल लिए गीत गाती आईं। नौकर-चाकर सब पहले के समान ही आ गए। संपदाजी का डोरा बाँधने के कारण ही यह सब फल प्राप्त हुआ। इसलिए सभी को श्रद्धापूर्वक माँ संपदाजी की पूजा करनी चाहिए और स्त्रियों को कथा-पूजन कर डोरा धारण करना चाहिए।


बोलो संपदा माँ की जय! 
ब्रह्मचर्य रक्षा मंत्र
यह प्रयोग स्वयं सिद्ध है ! इसे सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है ! फिर भी पर्व काल में एक माला जप ले !
जिन लोगों की साधना बार बार स्वप्नदोष की वजह से भंग हो जाती है वह इसका इस्तेमाल जरुर करे !
एक बात का हमेशा ख्याल रखे कि यदि आपका मन पवित्र नहीं है तो किसी भी उपाय से ब्रह्मचर्य की रक्षा नहीं हो सकती !
|| मंत्र |
“सत नमो आदेश ! गुरूजी को आदेश !
पारा पारा महापारा पारा पहुंचा दशमे द्वारा दशमे द्वारे कौन पहुंचाए ?
गुरु गोरखनाथ पहुचाये , जो न पहुंचाए तो हनुमान का ब्रहमचर्य खंडित हो जाये ,
माता अन्जनी की आन चले , गुरु गोरख का वान चले ,
मेरा ब्रहमचर्य जाये तो हनुमान त्रिया राज्य में रानी मैनाकनी को भोग के आये !
दादा गुरु मत्स्येन्द्रनाथ आओ जैसे हनुमान का ब्रहमचर्य रखा हमारी भी लाज बचाओ !
ॐ गुरूजी भग में लिंग , लिंग में पारा जो राखे वही गुरु हमारा !
काम कामनी की यह आग इसे मिटावे गोरखनाथ
माया का पर्दा देयो हटा दादा गुरु मत्स्येन्द्रनाथ !
दुहाई दादा गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की ! आदेश गुरु गोरख के !
नाथ जी गुरूजी को आदेश आदेश आदेश !
|| विधि ||
रात को सोते समय इस मंत्र को 21 बार जप करे और लाल लंगोट धारण करे ! लंगोट धारण करते वक़्त भी इस मंत्र का जाप करे !
भगवान से हमारी यही कामना है कि आपको साधनाओं में सफलता प्रदान करे !
जय सदगुरुदेव ..!!

Tuesday, 24 June 2014

गालियों का समाज शास्त्र

गालियों  का प्रचलन समाज में कब से प्रारम्भ हुआ और सबसे पहले किसने किसको गाली दी थी तथा सुनने वाले पर उसकी प्रतिक्रिया किस रूप में प्रकट हुई थी– यह एक मजेदार शोध का विषय हो सकता है। अनेक पूर्ववर्ती विद्वानों ने गालियों के उद्भव और विकास पर युगों-युगों से माथा-पच्ची की हैकिन्तु इस अथाह रहस्य को आज तक शायद कोई नहीं जान पाया। तथापि इस लेख के पाठकों के समक्ष बिना कोई गाली-गलौज किये यह शिष्टलेखक अशिष्ट मानी जाने वाली गालियों के परम्परागत मूल्यों की विवेचना करने की चेष्टा कर रहा है। हमारे विचार से गालियों का प्रादुर्भाव भाषा के विकास के साथ-साथ ही हुआ होगा। तीक्ष्णअप्रिय और अपमानित करने वाले शब्दों को गाली’ माना गया है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि शब्दों के निर्मम प्रहार जब विद्रूप हो उठें और जिन्हें सुनकर मनुष्य क्रोधित और अनियंत्रित हो उठेवह गाली माना जाता है। शब्द-प्रहारशस्त्र-प्रहार से कहीं अधिक घातक और मर्मभेदी हो सकता हैऔर प्राय: होता भी है। स्मरण कीजिएमहाभारत का वह प्रसंग जब द्रोपदी ने दुर्योधन का उपहास अंधे का अंधा’ कहकर किया था। इस उपहास का ही परिणाम राष्ट्र के सामने महाभारत’ के रूप में उपस्थित हुआजिसमें भारी नरसंहार और रक्तपात हुआ।
गालियों का प्रचलन सदियों से समाज में रहा है। गालियाँ निर्बल का शस्त्र मानी गयी हैं। बलवान व्यक्ति अपनी शारीरिक और शस्त्रगत ताकत से जब निर्बलों पर आक्रमण करते हैंतो अशक्त और निर्बल जन गालियों के प्रहार से ही उनका प्रतिकार कर पाते हैं। वीर और साहसी व्याqक्तयों को गाली देने की आवश्यकता ही क्या हैवे तो अपनी शक्ति के बल पर ही प्रतिद्वंद्वी का मानमर्दन कर सकते हैं। गाली देना उनके गौरव के अनुवूâल भी नहीं माना जायेगा। श्रीरामचरित मानस में लक्ष्मण जी ने परशुरामजी को नसीहत देते हुए कहा है
वीर व्रती तुम धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
किन्तु अंगद-रावण संवाद मे गालियों का उन्मुक्त आदान-प्रदान हुआ है। रावण व अंगद दोनों ही लगभग समान रूप से बली थे। दूसरेअंगद  शांति-दूत बनकर गये थे। उन्हें शस्त्र-प्रहार की अनुमति नहीं थीअत: उन्होंने शब्द-प्रहार का सहारा लिया। इसी प्रकार रावण भी राजनीति के नियमों के अनुसार शांति-दूत पर शस्त्र-प्रहार नहीं कर सकता थाअत: उसने भी शब्द-प्रहार यानी कि गालियों का ही अवलंबन लिया। गालियाँ मानव-मन के भले-बुरे उद्वेगों को व्यक्त करती हैं। गालियाँ देने और गालियाँ सुनने वाले– दोनों ही पक्ष भावनात्मक रूप से उत्तेजित हो जाते हैं। इससे दोनों की असली औकात खुलकर सामने आ जाती है। किसी ने कहा भी है कि यदि किसी की औकात आँकनी हो तो उसे क्रोध दिला दो।
गालियों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वे मानव-जाति के परस्पर सम्बन्धों को अनायास उद्घाटित करती हैं। यूँ तो गालियाँ विश्व की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में कही-सुनी जाती हैंकिन्तु भारत में गालियों का अपना अलग ही अन्दा़ज है। भारत में गायी हुई गालियों का बुरा नहीं माना जाता। कदाचित् इसीलिए हमारे यहाँ विवाह-शादियों में तथा होली जैसे त्यौहारों पर गालियों को गाने की पुरातन प्रथा चली आ रही है। विवाह मेंं महिलाओं के द्वारा और होली पर पुरुषों के द्वारा गायी जाने वाली और उमंगमय गालियों का कोई बुरा नहीं मानता
जेंवत देहिं मधुर धुनि गारी।
ले ले नाम पुरुष अरु नारी।।
समय सुहावनि गारि विराजा।
हँसत राउ सुनि सहित समाजा।।
श्रीराम के विवाह-समय पर जनकपुर की महिलाओं के द्वारा गायी हुई गालियाँ आज भी विवाह-बारातों में हम अपने-अपने संदर्भ में अपनी पारिवारिक महिला-सखियों-सहेलियों से सुनते हैं और प्रसन्न होते हैं। जबकि अन्य किसी अवसर पर दी हुई किसी की भी गाली हमें गोली की तरह बींध कर रख देती है और क्षणभर में खून-खराबे की नौबत आ जाती है।
गालियों के अनेक प्रकार हैं। कुछ गालियाँ जाति-बोधक होती हैंतो कुछ संबंध बोधक। कुछ गालियाँ मानव की विकलांगता से जुड़ी होती हैंतो कुछ उसके स्वभाव से। कई गालियाँ मानव का जानवरों से तादात्म्य स्थापित करती हैंतो कई गालियों में उसके बौद्धिक स्तर की धज्जियाँ उधेड़ दी जाती हैं।
      क्रोध में दी गई गालियों में प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने का भाव निहित होता हैजबकि उमंग और अनुराग में दी गई गालियाँ घनिष्टतम प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं। कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि गालियों का उच्चारण मानव की दमित कामेच्छाओं को शमित करता है। गालियों से परहेज करने वाले कितने ही तथाकथित शिष्ट लोग एकांत में अशिष्ट और अश्लील हरकतों में लिप्त देखे जा सकते हैं। ऐसा माना जा सकता है कि गालियों का प्रचलन मानव के आदिम विकास-काल से आज तक यथावत् बना हुआ है। गालियों से मनुष्य के काम और क्रोध– इन दो विकारों का निस्तारण काफी हद तक हो जाता है।  होली का त्यौहार गालियों के आदान-प्रदान का उन्मुक्त त्यौहार है। इसे शास्त्रकारों ने मदनोत्सव की संज्ञा दी है। मदन का अर्थ काम से है। भारतीय जन अपने काम-गत विकारों का निस्सरण करने के लिए होली पर गोली छान कर गाली बकते हुए देखे जाते हैं। यह परिपाटी सदियों से चली आयी है। शास्त्रकारों-विद्वानों ने इसका अनुमोदन भी किया है और इसे हमारी धार्मिक आस्थाओं से जोड़े रखने की चेष्टा भी की है। उन्होंने हिरण्यकश्यपु की बहन ढुंढा (होली) को जलाते समय गालियाँ बकने का शास्त्रीय विधान निर्धारित किया हैजिससे कि वह राक्षसी तृप्त और प्रसन्न होकर अपनी दाह-शक्ति को प्रचण्ड बनाये रखे
तमग्नित्र्रिपरिक्रम्य शब्दै लिंग-भगांकितै,
तेन शब्देन सा पापा राक्षसी तृप्तिमाप्नुयात्।
जो भी होगालियों का अपना एक अलग समाज-शास्त्र है जिसे मानव की भावनात्मक-वैचारिक और संवेदनात्मक ऊर्जा के संचयन तथा उसमें उत्पन्न हुए अनावश्यक विकारों के निस्तारण के लिए हमारे पूर्वजों ने निर्धारित किया है। इसमें तथाकथित सभ्यतावादियों के अरण्य-रोदन से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है। यह सृष्टि गाली से ही शुरू हुई थी और गाली पर ही समाप्त होगीयह एक शाश्वत सत्य है।
क्योंकि मानव-देह एक गाली ही है जो गलीज जगह से जन्म लेकर गलियों-गलियों भटकती अन्त में गलकर रह जाती है। अत: इस देह के गलने से पहले गालियों के मर्म को समझ लेना बहुत आवश्यक है।

Monday, 23 June 2014

#1 MULADHARA - Part 4
The Root Chakra - The Coiled Serpent Fire

MuladharaMy Favorite Quotes About Chakras
“Energy, in modern scientific thought, is conceived as existing in two forms—bottled-up energy and released energy; observable motion is predicated of the latter. Sri Ramakrishna often referred to these two aspects of Reality. One aspect is Brahman, the Absolute and the Infinite, the immobile and therefore, the unmanifested. The other aspect is Sakti, Divine Energy, the creative power of the Absolute, expressing as vibration or movement. He used the simile of a serpent (the 1st Chakra). Brahman is the serpent coiled up, motionless; Sakti is the same serpent in motion, its energy released. Thus Brahman and Sakti, God and the universe, are not two separate realities, different from each other, but two aspects of one and the same thing, one reality looked at from two different points of view.
“Thus it is that, attempting to explain this fact, the Upanishad resorts to the most paradoxical language: 'It is far, and It is near, It is within all this, and It is also outside all this.'”
—The Message of the Upanishads, Swami Ranganathananda
“Chakras are psychic centres that lie along the axis of the spine as consciousness potentials. The chakras are not materially real and are to be understood as situated, not in the gross body, but in the subtle or etheric body. Repositories of psychic energies, they govern the whole condition of being.” —www.tantra-kundalini.com/chakras.htm
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“One of the chief centers is that wherein dwells the Kundalini force. Kundalini means, literally, the 'coiled up'; is the dormant or sleeping power of the Supreme Life, which is in everything. It is found at the base of the Susumna (the middle channel passing through the spinal cord). It embraces the three channels, Ida (the moon), Pingala (the sun) and Susumna (the fire), and where these three merge they mingle and create a substance known as vija, which is intensely powerful and active, which passes through the entire body as a subtle force, giving motion, life and sensation, but most particularly—energy. This combination is known as the fundamental lotus, the base upon which rests all life within the body.” —Practical Yoga and Persian Magic by O. Hashnu Hara
“The Susumna passes up the spinal cord to the right side of the Ajna Chakra and from there passes to the left nostril. The stream of fluid (from the Moon) comes up and passes to the left nostril. The Pingala comes from the left side of the Ajna Chakra and goes to the right nostril.” —Practical Yoga and Persian Magic by O. Hashnu Hara. (Think of this when you practice The Moon Salutation, too!)
“The first or the base chakra is situated on the anterior side of the coccyx at the furthermost sympathetic nerve center of the spine, called the ganglion impar. It is here the coiled serpent in the form of the Kundalini power lies in wait for its rise up the spinal cord to unite with the crown chakra. This base chakra is related to the suprarenal cortex (Reiki hand position No. 11), the main nectar for adrenal or sympathetic function. It connects to the sexual chakra from which it draws the flame to awaken the Kundalini. It also connects to the important subchakras in the soles of the feet which anchor its polarity to the planetary body.” —Ambres
The suprarenal cortex is also known as the cortex of the suprarenal gland, c. glandulae suprarenalis. The adrenal glands come under this category. “As the name suggests, it is located at the cephalic pole of each of the two kidneys. The right gland resembles a pyramid, or the cocked hat of colonial days; the left is semilunar in form and tends to be slightly larger. The medulla of the suprarenal gland is developed from cells of the neural crest which migrate along with the cells which form the sympathetic ganglia. These cells later detach themselves from the ganglia and become small knots of glandular cells scattered along the vertebral column.” —Gray's Anatomy Centennial Edition (1859-1959), The Suprarenal or Adrenal Gland, pp. 1401. (This gives one the powerful visual of how the energy of the Muladhara Chakra travels throughout the vertebral column on a physical level, and this is only one small part of it!)
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“The Chakras are specialised channels of Colour force. It should be noted that the Red and Orange Chakras (the 1st and 2nd), which have to do with the physical and etheric aspects in man, are very closely related and are sometimes classed together as a single unit. Concisely speaking, they are the etheric organs working through thought and feeling directly upon the physical body.” —The Power of the Rays by S.G.J. Ouseley
“Deep rhythmic breathing is of great value—it enables us to draw in a much greater supply of physical prana (energy) than the shallow, unmeasured form of breathing. The most beneficial form is Colour Breathing.” —The Power of the Rays by S.G.J. Ouseley (1951) (This is why I give color visualizations for each Chakra throughout this series. Learn them. You will see a difference in how much more energy you feel within you.)
“Chakra: Literally, a wheel or circle. Energy (prana) is said to flow in the human body through three main channels (nadis), namely Susumna, Pingala and Ida, which start respectively from the right and left nostrils, move up to the crown of the head and course downwards to the base of the spine. These two nadis intersect with each other and also the Susumna. These junctions of the nadis are known as Chakras or the fly-wheels which regulate the body mechanism.” —Unknown source
“Exactly how light penetrates or influences the body is not easy to comprehend. One view is that a permeation of the cells takes place as in ordinary osmosis. The most favored view, however, is that light and color influence the body by arousing sympathetic vibrations within the organism. In other words, light and color work according to the Law of Attraction.
“In studying the nature of light it is important to remember that all radiations emitted from a luminous body travel through space in perfect rhythmic vibrations in the form of waves. The point of distance from crest to crest is called the wavelength and their 'beat' or rate of vibration is known as their frequency. Colors have varying wavelengths. For instance, Violet consists of very short waves, while Red has much longer ones. These facts are important in treating disease. The deep, slow warming vibration of Red light stimulates and invigorates the system, while the shorter and higher Violet and Blue waves calm and pacify.” —The Power of the Rays by S.G.J. Ouseley
मगध क्षेत्र की धार्मिक परंपराएं

पूनम मिश्र

कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट
मगध में अनेक धार्मिक परंपराएं उत्पन्न हुई और विभिन्न कालखंड़ों में उनका विकास हुआ। यहां का लोक जीवन इन स्थानीय परंपराओं से प्रभावित हुआ। साथ ही अन्य स्थानों में उपजी और विकसित हुई परंपराओं का भी अनुगमन मगधवासियों ने किया। इसी कारण से मगध क्षेत्र बहुपरंपरा प्रेमी हैं। सुधारवादी प्रभावों को आत्मसात करते हुए समाज का अधिकांश एक पहचान के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है तो कुछ परविरों में विभिन्न परंपराओं की स्वतंत्र पहचान भी बनी हुई है। आबादी का बड़ा भाग हिन्दुओं का है जिसे मिश्रित जीवनशैली वाला आधुनिक सनातनी समाज कहना अप्रासांगिक नहीं होगा। प्रमुख परंपराओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।

वैष्णव सनातनी

भगवान विष्णु एवं उनके विविध अवतारी रुपों की अराधना करने वाले वैष्णव कहे जाते हैं। बारह अवतारों में राम एवं कृष्ण के अतिरिक्त महावराह, कूर्म, परशुराम एवं बुद्ध के प्रति विशेष आस्था यहां की लोक परंपरा है। इन बारह अवतारों के अतिरिक्त कई स्थानीय अवतारी रुप भी स्वीकृति हैं। जिनमें जीमूत (जीउत), कर्मा (कर्म भगवान) चतुर्दशभुवनव्यापी अनंत एवं सत्य नारायण के बिला लोक-जीवन अधूरा है।

वैष्णव धर्म में मुक्ति के चार उपायों में एक उपाय यह सुझाया गया है कि पितरों का श्राद्ध कर्म संस्कार सम्पन्न किया जाए। इसका मुख्य केन्द्र मगध धरती गया ही है। यहां विष्णुपद मंदिर है जो फल्गु तट पर स्थित है। यहां भाद्रपद की पूर्णिमा के उपरान्त अश्विन कृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर अमावस्या तक के कुल पन्द्रह दिनों की अवधि में वि प्रसिद्ध मेला का आयोजन किया जाता है, जिसे "पितृपक्ष' के नाम से जाना जाता है। प्रतिवर्ष इस मेले के दौरान भारत के ही नहीं बल्कि वि के विभिन्न देशों यथा वर्मा, मारीशस, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान, फिजी, बांग्लादेश, गुयाना तता सूरीनाम आदि देशों से अपने पूर्वजों पर श्रद्धा रखने वाले वैष्णव धर्मावलम्बी पितृ ॠण से मुक्त होने के लिए लाखों की संख्या में गया आते हैं तथा अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तपंण और श्राद्ध कर्म करते हैं।

पिंडदान का प्रारंभ पटना जिला स्थित पुनपुन घाट में पूजापाठ से होता है। तत्पश्चात् गया जी धाम आया जाता है। पुनपुन को गया क्षेत्र का द्वार कहा जाता है।

वैष्णव धर्मावलम्बियों का एक प्राचीन मंदिर गया जिला स्थित कोंच गांव में हैं जो क्रौंच मंदिर से प्रसिद्ध है। इसमें से विष्णु को हटाकर शिवलिंग की स्थापना कर दी गई है और आमजन उसे बुढ़वा महादेव के नाम से जानते हैं। विद्वान लोग क्रौंच गांव को वैष्णवों का प्रमुख गढ़ मानते हैं। उनके अनुसार यदि कोंच गांव की खुदाई हो तो वैष्णवों का गढ़ होने का बहुत सारा प्रमाण मिलेगा।

शैव

शिव को परमेश्वर मानने वालों को शैव और उनके धर्म को शैव मत कहा जाता है। शिव का अर्थ है शुभया कल्याण। ऐसे शिव का अलग-अलग महत्व और नाम है मगर इस मगध क्षेत्र में शिव भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं। इस क्षेत्र में शैव मत मानने वालों के प्रमुख केन्द्र या मंदिर निम्नलिखित हैं -

वाणेश्वर मन्दिर (बराबर पहाड़), पिता महेश्वर (गया), च्यवनाश्रम (देवकुण्ड), भृगुरारी (भेंड़ाड़ी), मधुश्रवा (मेंहदिया), शिव मंदिर (कोंच)

बाणेश्वर मंदिर, बराबर शैव और वैष्णव समन्वय का प्रतीक है। वाणासुर और कृष्ण के बीच युद्ध की कथी इसी बराबर पहाड़ से सम्बन्धित है जो युद्ध रक्त संबंध में बदलकर शैव वैष्णव समन्वय का प्रमुख केन्द्र बन गया। मगध क्षेत्र में प्राय: सभी प्रकार के शिवलिंग पाये जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि शैव साधना की विभिन्न धाराओं का प्रभाव इस क्षेत्र में रहा है।

शाक्त

शक्ति की उपासना करने वालों को शाक्त और उनके मत को शाक्त मत कहा जाता है। इस मत में विविध देवियों की पूजा की जाती है। शक्ति को ही मंगलागौरी, कौलेश्वरी, तारा, थगला, कामाख्या, काली, दुर्गा, संतोषी, आनन्द भैरवी, महा भैरवी, त्रिपुरसुन्दरी ललिता आदि नामों से पुकारा जाता है। शक्ति की उपासना प्राय: तीन पद्दतियों से होती है।

(क) सामान्य शिष्ट पद्धति, जिसमें अहिंसात्मक ढंग से अन्य देवों की तरह ही शक्ति की पूजा होती है।
(ख) भयंकर पद्धति, जिसमें शक्ति का सम्बन्ध कापालिकों और कालमुखों के मतों से है और जिसमें पसुओं तथा मनुष्यों का बलिदान विहित है और
(ग) भावात्मक पद्धति, जिसमें उपासक अपने उपास्य देवता के साथ तारतम्य स्थापित करता हुआ पूजा करता है। प्राय: अन्तिम पद्धति का पालन करने वालों को ही शाक्त की संज्ञा दी जाती है। प्रथम और द्वितीय वालों को स्मार्त कहा जाता है।

मगध क्षेत्र में शाक्त मत के प्रमुख केन्द्र मंगलागौरी, कौलेश्वरी, तारादेवी मंदिर (केसपा) तारादेवी (मदनपुर, उमगा पहाड़) बगला स्थान (गया) तथा कामाख्या मन्दिर (गया) है।

इस क्षेत्र में यक्ष-यक्षिणियों को भी पूजने की प्रथा है। खासकर यक्षिणियां इधर देवियों के रुप में परिवर्तित हैं। लोग उन्हें देवियों के रुप में पूजते हैं, मगर वास्तव में वे यक्षणियां है। यक्षिणी के नाम पर इस मगध क्षेत्र में कई गांव देखने को मिल जाते हैं। औरंगाबाद जिले के शमशेर नगर ग्राम के बड़े तालाब में यक्ष पूजा करने की परम्परा थी जो अब लुप्त हो गयी।

कौल

"कुल' शब्द शक्ति का वाचक है और "अकुल' शिव का तथा कुल और अकुल का सम्बन्ध स्थापित करने वाला मार्ग है। "सौभाग्य-भाष्कर' में कहा गया है -

"कुलंशक्तिरिति प्रोक्तमुकलं शिव उच्यते।
कुलेऽकुलस्य संबन्ध कौलमित्यभिधीयते।'

यहां कौलयत के लोग हैं। कौल मत वाले लोग वामाचारी होते हैं। बाद में कौल और कापालिक बहुत करीब आ गये थे। इस क्षेत्र में कौल मार्ग की तीर्थस्थली कौलेश्वरी है जो गया जिले की दक्षिणी सीमा से सटे चतरा जिले में है।

सौर

इस इलाके में मग ब्राह्मण अपने को सूर्य के वंशज मानते हैं और दावा करते हैं कि भारतवर्ष में सूर्य पूजा का प्रारम्भ इन्हीं लोगों ने कराया। अनेक गांवों में मग ब्राह्मणों के यहां सूर्य ही विविध रुपों में कुल देवता होते हैं और उन्हीं की पूजा होती है। इनके अतिरिक्त भी पर्वों� पर पूरी जनता अत्यंत श्रृद्धा भाव से छठ व्रत करती है। मगध का यह मुख्य पर्व है। मगध के ये ब्राह्मण द्वादश आतित्यों की अवधारणा में विश्वास करते हैं। मग ब्राह्मण अपने को बाहर से शाकद्वीपीय ब्राह्मण कहते हैं। इसका प्रमुख केन्द्र या तीर्थ स्थल सूर्य मन्दिर (देव) है। कुछ अन्य केन्द्र भी हैं - जैसे ओलार, पांडारिक (नालन्दा)

देव (औरंगाबाद) स्थित सूर्य मंदिर और तालाब का महत्व काफी है। कार्तिक एवं चैत शुक्ल षष्ठी को यहां सूर्य को अध्र्य देते हैं जिसे लोकभाष में "छठ' कहते हैं। "बिहारे प्रसिद्धम सूर्यषष्ठी व्रतम' की उक्ति इसी से सम्बन्धित है. देव मंदिर का पुरातात्विक दृष्टि से भी काफी महत्व है। यहां दूर-दूर से "छठ करने श्रद्धालु आते हैं।

जैन

विभिन्न शहरी क्षेत्र में जैन मंदिर एवं उनके अनुयायी पाये जाते हैं। श्वेताम्बर व दिगंबर दोनों संप्रदाय के लोग मगध क्षेत्र में है। आचार्य तुलसी का बहुत बड़ा केन्द्र वीरायतन (राजगृह) में है। तीर्थ के रुप में राजगृह का वीरायतन क्षेत्र एवं पहाड़ियों पर बने अनेक मंदिर हैं। पावापुरी में महावीर का निर्वाण स्थली है।

भेरवादी हीनयानी

हीनयानी लोग पालि त्रिपिटक में आस्था रखते हैं। इन्हें ये भेरवादी भी कहते हैं। अभी कुछ नये मतावलम्बी लोग इस परम्परा में हो रहे हैं। लेकिन इसके पहले से यहां कही भई हीनयानी नहीं पाये जाते हैं। मगध क्षेत्र में भेरवादी हीनयान का प्रमुख केन्द्र मुख्य मंदिर (बोधगया) तथा लंका, वर्मा, कम्बोड़िया एवं थाइलैण्ड के बोधगया स्थित विहार हैं।
महायान

महायान के लोग परोपकार करना अपनी साधना का अनिवार्य अंग मानते हैं। व्यक्तिगत कल्याण की तुलना में सामाजिक कल्याण को श्रेष्ठ मानने के कारण ये अपने मार्ग को महान मानते हैं। महायान परम्परा में देवी-देवताओं की पूजा होती है। मगध क्षेत्र में आज भी तारा, एक जटा, अंधारी, यक्षिणी आदि की पूजा की जाती है। लेकिन अपने को बौद्ध कहकर यह पूजा नहीं होती है। मगध क्षेत्र में इनका प्रमुख केन्द्र बोधगया तथा गृद्धकुट पर्वत (राजगीर) है।

बज्रयानी

आज की तारीख में कोई अपने को बज्रयानी नहीं कहता लेकिन मगध क्षेत्र में बज्रयानियों के केन्द्र होने की बात इतिहास में कही गयी है। बोधगया में अब बज्रयानियों के बिहार भी बनाये गये हैं। जिनमें कर्मापा मंदिर का नाम लिया जा सकता है।

सहजयान एवं सिद्ध पंथ

मगध क्षेत्र में बौद्धसिद्ध पंथ, जो सहजयान के नाम से जाना जाता है, का बहुत प्रभाव रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि बौद्ध-सिह पंथ के संस्थापक सरहप्पा के आह्मवाहन पर मगध के एक उत्कृष्ट उच्चवर्गीय ब्राह्मण एवं बौद्ध समूह ने शास्र पढ़ना ही बन्द कर दिया। विवाद के भय से नामोल्लेख नहीं किया जा रहा है। इन ब्राह्मणों के घर में डोम्भी, सोम्भी आदि देवताओं की पूजा कुल परंपरा के अनुसार होती है। मनु के बाद अगर इस क्षेत्र मे किसी दूसरे व्यक्ति का प्रभाव है तो वे सरहप्पा हैं। सरहप्पा ने अनेक सामाजिक नियमों आसना शैलियों व मनोरंजन के प्रकारों का सृजन किया है। जो आज भी लोक जीवन में प्रचलित हैं। मगही में "सरह' शब्द नियम-परम्परा का पर्यायवाची शब्द है। सरहप्पा की अनुष्ठान विधियां लोक जीवन के अभिन्न अंग है। सरहप्पा के प्रमुख ग्रन्थों में दोहाकोश व चर्यागीति है।

सुन्नी

इस्लाम के अनुयायियों में सबसे अधिक तादाद सुन्नियों की है। यही इस्लाम की मुख्यधारा भी है। सुन्नी लोग अल्लाह की इबादत करते हैं और कुरान व हदीस को अपनी मार्गदर्शक किताब मानते हैं। स. हजरत मोहम्मद को ये लोग आखिरी पैगंबर मानते हैं।

शिया

और सारे मामलों में शिया फिरका भी सुन्नियों के ही समान है। लेकिन शिया लोग इस्लाम की शुरुआत के चार खलोफों में से तीन हजरत अबूबक सिद्दीक, ह. उस्मान गनी तथा उमर फारुख को नहीं मानते। रोजा, नमाज, अजान आदि धार्मिक व्यवहारों में भी थोड़ा फर्क है।

मगध में शिया बिरादरी के लोगों की तादाद काफी कम है लेकिन ये लोग भी यहां बहुत पहले से मौजूद हैं।

सूफी

अन्य धार्मिक मान्यताओं में ये लोग सुन्नी बिरादरी जैसे ही हैं लेकिन अपने मशहूर संतों की मजार पर चादर चढ़ाकर श्रद्धा दिखाने के मामले में ये उनसे भिन्न हैं। सूफियों का धार्मिक रहस्यवाद भी भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से काफी समानता रखता है।

मगध में सूफी लोगों की आबादी भी काफी कम है। पीर मंसूर, बीथो शरीफ, अयझर शरीफ आदि इनके मशहूर दरगाह हैं।

कबीर पंथ

"कबीर पंथ' का शाब्दिक अर्थ वह सम्प्रदाय है जिसे सन्त कबीर ने किसी समय चलाया था और जो अब तक इस नाम से प्रचलित है। पर यह बताना कठिन है कि सन्त कबीर साहब ने ऐसे किसी पंथ का कभी प्रवर्तन किया था अथवा इसके लिए उन्होंने अपने शिष्यों को कोई स्पष्ट आदेश ही दिया था। ऐसी दशा में यह अधिक संभव है कि उनके निजी विचारों के पंथ निर्माण के प्रतिकूल होते हुए भी उनके शिष्यों-प्रशिष्यों ने ऐसा करना प्रचार की दृष्टि से उचित समझ लिया हो। मगध क्षेत्र में भी कबीर का व्यापक प्रचार हुआ। गया में इसका एक प्रमुख केन्द्र कबीर बाग मठ है। गांवों में कबीर पंथी किसान कबीर दास की साखियां एवं पद सुनाते बहुतायत में मिलते हैं जो पकड़ लेंगे तो आपको जल्दी छोड़ेगें नहीं। इस क्षेत्र के कबीर पंथी दशरथ मांझी प्रेम, लगन एवं परिश्रम की एक मिसाल के रुप में उत्तरी प्रखण्ड में हैं। उन्होंने १३०० फिट लंबा और १५ फिट चौड़ा रास्ता अकेले पहाड़ काटकर बनाया है।

सिक्ख पंथ

सिक्ख पंथ मानता है कि परमात्मा एक अनन्त सर्वशक्तिमान, सव्य, कर्ता, निर्भय, अयोनि व स्वयंभू है। यह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति पूजा आदि निरथर्क है। बाह्य साधनों से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। आन्तरिक साधना ही उसकी प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। गुरु कृपा, परमात्मा कृपा एवं शुभ कार्यों का आचरण इस साधना के अंग हैं। नाम स्मरण उसका सर्रोपरि सव्य है और "नाम' गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। मगध क्षेत्र में सिक्ख पंथ का व्यापक प्रसार है। यहां खुद सिक्खों के आदि गुरु नानक आए थे। गुरु नानक की पहली "उदासी' (विचारण यात्रा) अक्टूबर १५०७ ई. से १५१५ तक रही थी। इसी यात्रा के क्रम में गया पटना आदि स्थानों की यात्रा उन्होंने की थी। गुरु तेग बहादुर ने सन् १६६५ ई. में अपनी धर्म प्रचार यात्रा आरम्भ की। इस यात्रा में उन्होंने मगध क्षेत्र के पटना, गया आदि अनेक स्थानों में विचरण किया। मगध क्षेत्र में गया शहर में गुरु तेग बहादुर की स्मृति में ही गुरुद्वारा है। पटना में पटना साहिब गुरुद्वारा है। सिक्खों के अंतिम गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पटना में ही हुआ था।

निरंकारी सिक्ख

मगध क्षेत्र में इस पंथ का भी काफी विस्तार हुआ। इस पंथ के बारे में विशेष ज्ञान तत्काल नहीं है। गया जिले के डोभी व चतरा जिले के हटरगंज के समीवपर्ती गांवों में भी निरंकारी सिक्ख मिलते हैं।

आर्य समाज

सन् १८६७ में दयानन्द सरस्वती ने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने आर्य समाज के लिए वेदों को आधार माना। उनके अनुसार वेद अपौरुषेय हैं और वैदिक कर्म ही सत्य और सार्वभौम है। सामाजिक और नैतिक मूल्यों को देखते हुए आर्य समाज ने एक आचार संहिता बनायी थी। इसमें जाति-भेद और मनुष्य-मनुष्य या स्री-पुरुष में असमानता के लिए कोई स्थान नहीं है। निश्चय ही आर्य समाज ने राष्ट्रीय विचारधारा को आगे बढ़ाने में आश्चर्यजनक योगदान किया।

मगध क्षेत्र में भी यह आंदोलन काफी सक्रिय रहा। इस क्षेत्र में मुख्यत: मध्य वर्ग के लोग, खासकर कोइरी और चौरसिया (पनेरी) जाति के लोग इस समाज से जुड़े। महिलाओं के बीच शिक्षा के प्रसार में इसने भारी योगदान किया।

आर्य समाज से विघटित होकर कोइरी जाति के लोगों ने अर्जक संघ की स्थापना कर ली है। गया जिले के डुमरिया-ईमामगंज क्षेत्र में अर्जक संघ का व्यापक प्रचार प्रसार है।


कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट

मसीहा धर्म का मुख्य उद्देश्य आरम्भ से सेवा रहा है। इनके धर्मगुरु एवं परमेश्वर पुत्र प्रभु ईसा मसीह के शिक्षा का मुख्य विषय भी सेवा और आपसी प्रेम रहा। इसी आधार पर मगध प्रमंडल के तमाम चर्च काम कर रहे हैं, ऐसा गांधी मैदान, गया स्थित बैरिटस्ट प्रोटेस्टेन्ट चर्च के रेवरेन्ड ज्वाय मनीष विकल जी बताते हैं। मसीह धर्म शुरु में कैथोलिक ही था। कैथिलिक का अर्थ होता है सार्वभौमिक इसमें कुछ जड़तायें, कुछ रुढियां आ गयीं तो एक विद्रोह हुआ। विद्रोह के अगुआ मार्टिन लूथर थे। जिस मत ने प्रोटेस्ट अर्थात विद्रोह किया। वह प्रोटेस्टेन्ट मत के नाम से विख्यात हुआ।

मगध क्षेत्र का सबसे पुराना चर्च बैप्टिस्ट प्रोटेस्टेट चर्च है जो गांधी मैदान के बीच मे स्थित है। यह चर्च १८६७ में निर्मित हुआ। इसके संस्थापक सिडनी स्मिथ सांडर्स थे। इस चर्च के तहत बैप्टिस्ट मिशन गल्र्स स्कूल भी चलाया जाता है। दूसरा रोमन कैथोलिक चर्च क्रेन है। इसके तरह क्रेन मेमोरियल स्कूल चलाया जाता है। चर्च आॅफ नार्थ इंडिया (CNI ) तीसरा चर्च है। इसके तहत नाजरथ एकैडमी चलती है। इस क्षेत्र में और भी कई ईसाई मिशनों का पदापंण हुआ है, जैसे मदर टेरेसा मिशन। ये मिशन भी अपने कार्य में इस क्षेत्र में दक्षता से लगे हुए हैं।

उपर्युक्त धार्मिक परम्पराओं से परिचित होने के बाद निष्कर्ष यह निकलता है कि मगध की भूमि समन्वय की भूमि रही है। इतने सारे केन्द्रों के समानान्तर चलने के बाद भी लोग प्राय: समन्वयवादी हैं और एक ही परिवार में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते हुए, भिन्न-भिन्न पंथ मत को मानते हुए भी साथ रहते हैं।

Sunday, 22 June 2014


तंत्र-शास्त्र भारतवर्ष की बहुत प्राचीन साधन-प्रणाली है । इसकी विशेषता यह बतलाई गई है कि इसमें आरम्भ ही से कठिन साधनाओं और कठोर तपस्याओं का विधान नहीं है, वरन् वह मनुष्य के भोग की तरह झुके हुए मन को उसी मार्ग पर चलाते हुए धीरे-धीरे त्याग की ओर प्रवृत्त करता है । इस दृष्टि से तंत्र को ऐसा साधन माना गया कि जिसका आश्रय लेकर साधारण श्रेणी के व्यक्ति भी आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं ।

यह सत्य है कि बीच के काल में तंत्र का रूप बहुत विकृत हो गया और इसका उपयोग अधिकांश मे मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि जैसे जघन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाने लगा, पर तंत्र का शुद्ध रूप ऐसा नहीं है । उसका मुख्य उद्देश्य एक-एक सीढ़ी पर चढ़कर आत्मोन्नति के शिखर पर पहुँचता ही है ।

तंत्र-शास्त्र में जो पंच-प्रकार की साधना बतलाई गई है, उसमें मुद्रा साधन बड़े महत्व का और श्रेष्ठ है । मुद्रा में आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की सभी क्रियाओं का समावेश होता है । मुद्रा की साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है । मुद्राएँ अनेक हैं । घेरण्ड संहिता में उनकी संख्या २५ बतलाई गई है, पर शिव-संहिता में उनमें से मुख्य मुद्राओं को छांट कर इस की ही गणना कराई है जो इस प्रकार है-

(१) महामुद्रा (२) महाबन्ध (३) महाभेद (४) खेचरी (५) जालन्धर बन्द (६) मूूलबन्ध (७) विपरीत-करणी (८) उड्डीयान (९) वज्ा्रोजी और (१०) शक्ति चालिनी ।

तंत्र मार्ग में कुण्डलिनी शक्ति की बड़ी महिमा बतलाई गई है । इसके जागृत होने से षटचक्र भेद हो जाते हैं और प्राणवायु सहज ही में सुषुम्ना से बहने लगती है इससे चित्त स्थिर हो जाता है और मोक्ष मार्ग खुल जाता है । इस शक्ति को जागृत करने में मुद्राओं से विशेष सहायता मिलती है । इनकी विधि योग ग्रंथों में इस प्रकार बतलाई गई है-

महामुद्रा-
गुरु के उपदेशानुसार बाँये टखने (पैर की पिंडली और पंजे के बीच की दोनों तरफ उठी हुई मोटी हड्डी) से योनि मण्डल (गुदा और लिगेन्द्रय के बीच का स्थान) को दबाकर दाहिने पैर को फैला कर दोनों हाथों से पकड़ ले और शरीर के नवों द्वारों को संयत करके छाती के ऊपरी भाग पर ठुड्डी का लगा दें । चित्त को चैतन्य रूप परमात्मा की तरफ प्रेरित करके कुम्भक प्राणायाम द्वारा वायु को धारण करे । इस मुद्रा का पहले बाँये अंग में अभ्यास करके फिर दाँये अंग में करे और अभ्यास करते समय मन एकाग्र करके उसी नियम से प्राणायाम करता रहे ।

इस मुद्रा से देह सारी नाड़ियाँ चलने लगती हैं । जीवनी शक्ति स्वरूप शुक्र स्तम्भित हो जाता है, सारे रोग मिट जाते हैं, शरीर पर निर्मल लावण्य छा जाता है, बुढ़ापा और अकाल मृत्यु का आक्रमण नहीं होने पाता और मनुष्य जितेन्द्रिय होकर भवसागर से पार हो जाता है ।

खेचरी मुद्रा-
इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और सामधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है । इसके लिए जिह्र और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है, अर्थात एक दिन जौ भर काट कर छोड़ दिया जाता है, फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा सा और काट दिया जाता है । इस प्रकार थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त वाहिनी शिरायें अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं और किसी भय की सम्भावना नहीं रहती । जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास करता जाय ।

इस अभ्यास करने से कुछ महिनों में जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा जाय तो वह श्वांस जाने वाले छेदों को भीतर से बन्द कर देती है । इससे समाधि के समय सांस का आना जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है ।

विपरीत करणी मुद्रा-
योगियों ने मनुष्य के शरीर में दो मुख्य नाड़ियाँ बतलाई हैं । एक सूर्यनाड़ी और दूसरी चन्द्र नाड़ी । सूर्य नाड़ी नाभि के पास है और चन्द्रनाड़ी तालु के मध्य में है । मस्तक में रहने वाले सहस्रा दल कमल से जो अमृत झरता है वह सूर्य नाड़ी के मुख में जाता है । इसी से अन्त में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है । यहि अमृत चन्द्रनाड़ी के मुख में गिरने लग तो मनुष्य निरोगी, बलवान और दीर्घजीवी हो सकता है ।

इसके लिए तेज शास्त्र में साधक को आदेश दिया गया है कि सूर्यनाड़ी को ऊपर और चन्द्रनाड़ी को नीचे ले आवे । इसके लिए जो मुद्रा बतलाई गई है उसकी विधि शीर्षासन की है, अर्थात मस्तक को जमीन पर टिका कर दोनों पैरों को सीधे ऊपर की तरफ तान दें और दोनों हाथ की हथेलियों को मस्तक के नीचे लगा दें । तब कुम्भक प्राणायाम करें ।

योगि मुद्रा
इसके लिए सिद्धासन पर बैठकर दोनों अंगुठों से दोनों कान, दोनों तर्जनी उँगलियों से दोनों मध्यमा (बीच की उंगली) से दोनों नाक के छेद और दोनों अनामिका से मुंह बन्द करना चाहिए । फिर काकी मुद्रा (कौवे की चौच के समान होठो को आगे बढ़ाकर साँस खीचना) से प्राण वायु के भीतर खींच कर अपान वायु से मिला देना चाहिए । शरीर में स्थित छहों चक्रों का ध्यान करके 'हूँ' और 'हंस' इन दो मंत्रों द्वारा सोयी हुई कुण्डलिनी का जगाना चाहिये ।

जीवात्मा के साथ कुण्डलिनी को युक्त करके सहस्र दल कमल पर ले जाकर ऐसा चिंतन करना कि मैं स्वयं शक्तिमय होकर शिव के साथ नाना प्रकार का बिहार कर रहा हूँ । फिर ऐसा चिंतन करना चाहिए कि 'शिवशक्ति के संयोग से आनन्द स्वरूप होकर मैं ही ब्रह्म रूप में स्थित हूँ ।' यह योनि मुद्रा बहुत शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली है और साधक इसके द्वारा अनायास ही समाधिस्थ हो सकता है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मुद्राओं में शारीरिक मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार के अभ्यासों को ऐसा समन्वय किया गया है कि मनुष्य भीतरी शारीरिक शक्तियाँ, मानसिक जाग्रत हो जाती हैं और वह ऊँचें दर्जे के आत्मिक अभ्यास के योग्य हो जाता है पर का बात एक ध्यान रखना परमावश्यक है और वह यह कि मुद्राओं का अभ्यास किसी से सुन कर या पढ़ कर सही करना चाहिए, वरन् योग्य गुरु से सीख कर ही उसका अभ्यास करना अनिवार्य है ।
(सावित्री कुण्डलिनी एवं तंत्र- पृ-8.47)